ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों पर हमले
साल की शुरुआत में ही अलग-अलग घटनाओं में ऑस्ट्रेलिया गए दो भारतीय छात्रों की हत्या ने पूरे देश में उबाल पैदा कर दिया है। पिछले एक साल में मारपीट की सौ से ज्यादा घटनाएं चर्चा में आ जाने के बाद इन्हें संदर्भ से काट कर हत्या की अलग-थलग वारदातों की तरह देखना एक धूर्ततापूर्ण और खतरनाक कृत्य है। भारत के जो एक लाख 20 हजार छात्र फिलहाल ऑस्ट्रेलिया में पढ़ रहे हैं, वे अवैध बांग्लादेशियों की तरह घर से उठकर रातोंरात वहां नहीं पहुंच गए हैं। वे सब के सब पासपोर्ट-वीजा धारी लोग हैं और ऑस्ट्रेलियाई हुकूमत ने अपना सारा नफा-नुकसान सोच कर उन्हें अपने यहां बुलाया है। ऐसे में भारत के लोगों को जितनी तकलीफ ऑस्ट्रेलियाई राजनेताओं द्वारा इन घटनाओं को नस्ली भेदभाव से अलग कानून-व्यवस्था की समस्या बताने से है, उससे कहीं ज्यादा कष्ट उन्हें भारतीय विदेश मंत्री एस. एम. कृष्णा के इस बयान से हुआ है कि भारतीय छात्रों को हेयरस्टाइलिंग जैसे छोटे-मोटे काम सीखने के लिए ऑस्ट्रेलिया नहीं जाना चाहिए। भारत के लोग अपनी जरूरत और पात्रता के अनुसार संसार में कहीं भी आने-जाने के लिए आजाद हैं और जिन भी देशों को उनमें से किसी के आने पर आपत्ति है, वे उसे अपना वीजा न देने के लिए आजाद हैं। लेकिन विदेश गए हर भारतीय नागरिक के जान-माल की सुरक्षा की जिम्मेदारी संबंधित देश के अलावा भारत सरकार की, और खासकर उसके विदेश मंत्रालय की है, जिसे पूरी दक्षता और क्षमता के साथ अंजाम नहीं दिया जा रहा है। क्या विदेश मंत्री यह बताएंगे कि ऑस्ट्रेलिया स्थित भारतीय दूतावास ने भारतीय छात्रों की सुरक्षा के लिए अभी तक अपनी तरफ से क्या पहलकदमी ली है? छात्रों की ओर से जारी बयानों पर गौर करें तो लगता नहीं कि इस बारे में उनके पास बताने को ज्यादा कुछ है।
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